सोच

When I finally get tired of trying ,

I just wanna leave……

No fights, no arguments,

And ……….. not even

A ………GOODBYE

समझ नहीं आता कभी कभी कि आख़िर कौनसे रिश्ते सच्चे हैं और कौनसे दिखावटी। कभी जिन पर हम पूरी उम्र समर्पित करते हैं वो ही हम पर कभी यक़ीन नहीं कर पाते लेकिन दूसरी ओर वो लोग भी होते हैं जिन्हें हम कभी समझ नहीं पाते और वो हमें बहुत मान देते हैं। हम हमेशा उन लोगों पे यक़ीन करते हैं जो हमारे नहीं और जो हमारे होते हैं , हम उन्हें हमेशा अनदेखा करते हैं या उनका दिल दुखाते हैं। क्यूँकि शायद वो हर वक़्त हमारे आस पास जो होते हैं….. पर कभी सोचती हूँ तो लगता है कि जितना यक़ीन और मिठास हमारी भाषा में दूसरों के लिए होता है अगर उतना ही अपनो के लिए भी हो तो ज़िंदगी और भी ख़ूबसूरत लगे। पर पता नहीं क्यूँ ऐसा होता है कि दूसरे की थाली में हमेशा ज़्यादा दिखता है। अपनों से नाराज़गी दिखाई जाती है और जब किसी दिन अचानक हाथ छूट जाए तो भगवान से शिकायत की जाती है। क्यूँ ऐसा नहीं हो सकता की जब तक ज़िंदगी है हम क़द्र कर लें अपनों की ताकि जो भी जाए तो दूसरों के पास अच्छी यादें रहें …… मुस्कुराने और याद करके आँसूँ छलकाने की….. अच्छी बेहतरीन यादें…… बस्स्स्स्स्स्स्स्स्स्स्स्स्स्स्स्स्स !!!!!!!!!!

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