अकेली !

अकेली ही चली थी मैंअकेली रह गयी साथी
अकेली जा रही थी डगर पर

चल के मैं यूँ ही 

राह में मिल गया मुझको वो

जो लगा अपना सा साथी

था त्वरित वो मुझसे 

मगर ना जाने फिर भी क्यूँ

बहुत मुझसे हाँ वो मुझसे 

बहुत हिल मिल गया साथी
फिर क्यूँ यू मुझे राह में

छोड़कर चल दिया साथी

माना वो मुझे यूँ राह में ही 

छोड़कर है गया 

बहुत अकेली करके वो मुझको

अकेला चल दिया साथी
हुआ अवसान दिन का भी

गयी आ रात अँधियारी

हुआ है शांत भूमंडल

मगर नभ पर खिल क्यारी

सितारों का इशारा पा गया 

टूटा हुआ ये दिल

ना मंज़िल दूर थी हमसे

कहाँ तू खो गया साथी
पर बस एक सवाल का जवाब 

चाहूँगी मैं तुमसे

जो सच हो कहना वो मुझसे

ना करना तू दग़ा साथी 

बताओ तुम मुझे एक बात

क्यूँ ऐसा किया साथी
तुम्हें जो छोड़ना ही था 

मिले क्यूँ राह में आकर 

दिया था क्यूँ वचन तुमने

चाँद सितारों की क़सम खाकर

जब मिलाने थे ना डग से डग 

डगर पर एक दो डग भी

नज़र से हो गया ओझल

कहाँ तू खो गया साथी
अकेली ही चली थी मैं

अकेली रह गयी साथी।
स्वेता निक्की परमार 

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