पल !

कभी जो बैठे चुप से अकेले में 

तो सोचा ….

क्यूँ कुछ पल ज़िंदगी से हौले से निकल

जाते हैं ।

चाहे-अनचाहे, जाने-अनजाने एक अनकहा

दर्द औ उदासी छोड़ जाते हैं ।

विचलित, बेकल सा मन तड़प उठता है

उस तन्हाई में …

जी चाहता है तन्हाई को ही आग़ोश में लेकर

देर तक बस रोते रहें ।

काश मैं पा सकती फिर से उन लमहों को

जिन्हें जी सकूँ जी भर कर 

सुधार सकूँ कुछ ग़लतियाँ अपनी

मना सकूँ अपनी रूह को

बना सकूँ ख़ूबसूरत उन पलों को

बना पाऊँ बेहतरीन ज़िंदगी को

काश पा सकती उस सम्पूर्ण रूह को

सोच सकती हाँ अब जाकर ख़ुद से मुलाक़ात 

हुई फिर से ….।।।।।
स्वेता परमार “निक्की”

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