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क्यूँ ?!?

क्यूँ ?!?

नींद चुराने वाले पूछते हैं हमसे ……सोते क्यू नही….!!! हम सिर्फ़ इतना ही कह पाते हीं कि…. इतनी ही फिक्र है तो फिर …..हमारे होते क्यू नही….?!?!? जानती हूँ अब मंज़िले मुझे छोड़ गयी, और रास्ते ने पाल लिया है मुझे जबसे तूने सोचा है कि….. ….जा ज़िंदगी तेरी ज़रूरत नहीं मुझे दोस्तो ने संभाल लिया है…!!!.

फ़नाऽऽऽऽऽऽऽऽऽ !!!!!!

फ़नाऽऽऽऽऽऽऽऽऽ !!!!!!

क्यूँ है ये दस्तूर दुनिया का  जिसे चाहते हैं पास रखना  अक्सर…. उसे ही दूर कर देते हैं सब  पर कैसे करेंगे दूर दिल से तुझे मेरी रूह ए दिल  हर पल साथ है मेरे तू है ना …… या  नहीं है ?!? लगा था मुझे पा लूँगी तुझे एक दिन ख़ुशफ़हमी में थी की शिद्दत सच्ची है मेरी पर… Read more →

क़ब्र

जिस ज़मीं पर कभी सिर्फ़ हक़ था मेरा  आज वहीं मकान हैं किसी और का  ए मालिक मेरे …..तूने कैसे मिलाया ख़ाक में मेरी क़ब्र खोद दफ़ना दिया मुझे वहीं  जहाँ रोशन हुए गुल ….किसी और के साथ जो कभी थे मेरे……..ख़्वाब के !

अकेली !

अकेली !

अकेली ही चली थी मैंअकेली रह गयी साथी अकेली जा रही थी डगर पर चल के मैं यूँ ही  राह में मिल गया मुझको वो जो लगा अपना सा साथी था त्वरित वो मुझसे  मगर ना जाने फिर भी क्यूँ बहुत मुझसे हाँ वो मुझसे  बहुत हिल मिल गया साथी फिर क्यूँ यू मुझे राह में छोड़कर चल दिया साथी… Read more →

भरोसा !

भरोसा !

सुनो …सुनो नाहम कभी भी  अलग नहीं होंगे  वादा करो मुझसे हमेशा साथ दोगी मेरा  हाँ मेरी धड़कन  मेरी सांसें मेरी ज़िंदगी सब तुमसे हैं  मैं मरते दम तक ही नहीं मर के भी वादा निभाऊँगी  सुनो…….सुनो ना  हम कभी एक नहीं होंगे अब मैं तुम्हारी माँग का सिंदूर किसी और की माँग में  सज़ा रहा हूँ तुम्हारे सारे हक़ … Read more →

खिलोना !

खिलोना !

उसके प्यार ने पागल बना दिया इतना की खुदको भूला दिया  ज़माने से छिप कर की थी मोहब्बत  और इसने हे मुझे बेगाना बना दिया जी रही थी किसी तरह एक अधूरी आस पे अज उस ने हे मुझे छोड़ कर  घुट घुट के रहने को छोड़ दिया  ख़ुश है वो सुंदर घर सजाकर  मेरा घरोंदा उजाड़कर मुझे  नंगा खड़ा कर… Read more →

बावरा मन !

बावरा मन !

सोचा था पूछूँगी तुमसेक्या समय व्यतीत करने को कोई और बहाना नहीं बचा था जो मुझे उपाय चुन लिया और कुछ ना मिला तो .. मेरी भावनाएँ ही दिखी  खेलने को वक़्त गुज़ारने को क्यूँ नहीं दिखा मेरा  वो बावरा मन तुम्हें जो हर पल हर घड़ी साथ लेकर तुम्हें विचरण करता है  सम्पूर्ण आकाश में  जिसका प्यार समाहित है… Read more →

अपना अनजान !

अपना अनजान !

देखा है ज़िंदगी को पल में रूप बदलते अनजान सा अब लगता है वो हर बदलते पल में कभी बहुत अपना सा  तो कभी एकदम बेगाना  कौन है वो  क्या है अब वो एक सामाजिक व्यक्ति या  कोई बहरूपिया सा कुछ भी हो पर  ज़िंदगी है वो मेरी  आत्मा में बस है वो यक़ीन है कि वो है मेरा फिर… Read more →

तुम !!!

तुम !!!

मैं जानती हूँ मेरी ज़िंदगी, मेरी रूह तुम हो क्या हुआ जो मेरे ही बस नहीं तुम हो कोई आरज़ू नहीं है अब बाक़ी मेरी क्यूँकि अब ज़िंदगी नहीं रही मैं सिर्फ़ तेरी मेरी तो आख़री जुस्तज़ू तुम हो  पर सिर्फ़ मेरे लिए ही नहीं अब तुम हो मैं इस ज़मीन पे घना अँधेरा हूँ तुम आकाश हो अब सबके… Read more →

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